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Samarat Ashok (paperback)

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सम्राट अशोक, एक क्रूर सम्राट के रूप में उनके शासनकाल तक बिन्दुसार के बेटे के रूप में अपने शुरुआती दिनों के बाद संघर्ष किया है,आखिर में कलिंग में रक्तपात के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को गले लगाया।

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Data sheet

ISBN978-93-82422-30-3
Page552
Year2014
LanguageHindi
BindingPaperback
AuthorAshok Shrivastav

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‘सम्राट की जय!’ त्रिपथगा हर्षोन्माद से प्रफुल्लित कक्ष में प्रविष्ट होती हुई श्वास प्रच्छवास के मध्य बोली, ‘राजमहिषी ने पुत्र को जन्म दिया है।’
‘त्रिपथगे।’ बिन्दुसार के मुख पर आभा की असंख्य किरणें झिलमिलाई, ‘हर्ष की प्रथम सूचना तुमने दी है। उपकृत हुआ। लो ये मुक्ताहार और मुझे सूतिकागार में ले चलो।’
‘किन्तु सम्राट! सहसा वह गंभीर हो गई।’ ‘आप अभी कक्ष में नहीं जा सकते।’
”क्यों?“
पीड़ा से आहत राजमहिषी पुत्र को जन्मते अचेत हो गई हैं पलकें बन्द है, अधर निस्पंद और श्वास की गति मंद है।
‘सुभद्रं्रागी अचेत है?’ आश्चर्य से पूछा?
‘उनकी दशा गंभीर है।’
‘अच्छा! तिस पर तुम मुझे सूतिकागार में जाने से रोक रही हो?’ शब्दों में रोष था।
‘अपराध क्षमा हो।’ त्रिपथगा संयत भाव में बोली, ‘राजवैद्य की पुत्राी ने सूतिकागार में किसी को भी आने से मना किया है इसलिए मैंने आपको रोका किन्तु आप तो स्वामी हैं। राजमहिषी के पति। भला आपको रोकने का किसमें दुस्साहस है। चलें।’’
बिन्दुसार कक्ष से निकलने के लिए उद्यत हुये कि उसी क्षण अमात्य सुबंधु ने प्रवेश किया उनका मुख निष्प्रभ था। गंभीर वाणी में वे बोले, ‘भृत्य ने मुझे सूचित किया है कि राजमहिषी की दशा गंभीर है।’’

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सम्राट अशोक, एक क्रूर सम्राट के रूप में उनके शासनकाल तक बिन्दुसार के बेटे के रूप में अपने शुरुआती दिनों के बाद संघर्ष किया है,आखिर में कलिंग में रक्तपात के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को गले लगाया।

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